By THE KATHFODWA

रे की राय: बैंक वाले मजे में हैं और यह मजा सारी अर्थव्यवस्था टूटकर बिखर जाने तक चलता रहेगा

प्रकाश के रे वरिष्ठ पत्रकार हैं. भारत मे अंतराष्ट्रीय मसलों के चुनिंदा जानकर लोगों में से एक हैं. विश्व राजनीति…

By Ajay Kumar

संपादकीय: सवा दो करोड़ देशवासी नहीं रहे फिर भी हम मुर्दा शांति से क्यों भरे हैं?

साल 1991 से 2001 के बीच असमिया बोलने वाले लोगों की संख्या 58 फीसदी से कम होकर 48 प्रतिशत रह गयी. बंगाली बोलने वाले लोगों की संख्या 21 फीसदी से बढ़कर 28 फीसदी हो गयी.

By Avinash

फिल्म रिव्यू: ‘मुक्काबाज’ उत्तर भारतीय दर्शकों के साथ किया गया अब तक सबसे बड़ा धोखा है

मेरे गुरू जी कहते हैं कि कभी भी सिनेमा की समीक्षा उसके तकनीकी पहलुओं पर नहीं करनी चाहिये. सिनेमा एक…

By Avinash

‘टॉप टेन यू टर्न’- इन दस मुद्दों पर मोदी सरकार ने देश को बुरी तरह गुमराह किया

अमेरिकन अख़बारों में एक बेहतरीन चलन है. वह उम्मीदवार द्वारा चुनाव से पहले किये जाने वाले दावों/वादों की कठोर समीक्षा…

By Avinash

संपादकीय: अपनी इज्जत अपने हाथ, न्यायपालिका को अब सुधारों की दिशा में सोचना चाहिये

सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा की गयी प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐतिहासिक और अप्रत्याशित थी. हालांकि इसमें ऐसा कोई खुलासा नहीं हुआ,…

By THE KATHFODWA

रे की राय: ‘पद्मावत’ देखने का प्लान करने से पहले पिछले साल की यह 25 पेंडिंग फिल्में निपटायें

हिंदी सिनेमा बॉक्स ऑफिस और स्टार सिस्टम की मोह-माया से मुक्ति की ओर आत्मविश्वास से चल पड़ा है.