Featured

ओपिनियन: नागरिक होने के नाते सड़क पर उतरना जरूरी है, जो लोग ऐसा कर रहे वही देशभक्त

पुलिस ने कहा है कि हर्ष मंदर (Harsh Mander) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी कर कोर्ट की अवमानना की है जिसके लिए मंदर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना (Contempt) की कार्रवाई हो. लेकिन अपना वजूद खोती संस्थाओं की ओर से उनपर ऐसी कार्रवाई क्या वाकई वाजिब है?

क्या वाकई मंत्री सत्यपाल सिंह और राम माधव चर्च के षड्यंत्र का शिकार हो गये?

इस दुनिया में दो तरह के लोग पाए जाते हैं। पहले वो जो मानते हैं की ईश्वर हर चीज़ का कारण है और दुनिया उसी ने बनाई है। ये लोग ‘क्रियेशनिस्ट’ या ‘निर्माणवादी’ कहलाते हैं। दूसरे वो जो मानते हैं कि पूरा ब्रह्मांड परिवर्तनशील है। जैसा ये आज है वैसा पहले नहीं था, न आगे […]

Feature Photo

संपादकीय: कासगंज के ‘हिंदू’ लड़के को किसने मारा?

कासगंज (Kasganj) में कल एक लड़के की जान चली गई. एक सांप्रदायिक (Communal) बताए जा रहे हंगामे के दौरान पथराव हुआ, गोलियां चलीं, आगजनी हुई और इसी सब के बीच एक चन्दन गुप्ता (Chandan Gupta) मर गया. यह सब उस दिन हुआ, जब हम विधिसम्मत व्यवस्था में शामिल होने की तारीख का जश्न मना रहे […]

आईआईटी की टीम को रेलवे ट्रैक पर नहीं मिला कोई विस्फोटक, एक और फज़ीहत होने वाली है

यह ख़बर ‘द हिन्दू’ अख़बार में छपी विजेता सिंह की रिपोर्ट ‘कानपुर की रेल पटरियों पर कोई विस्फोटक नहीं: आईआईटी टीम’ को आधार बनाकर लिखी गई है. बड़े ही दुर्भाग्य के साथ कहना पड़ रहा है कि किसी भी अन्य मीडिया हाउस ने इस खबर को नहीं उठाया इसलिये इसे पढ़ने के बाद साझा जरूर […]

पढ़ें कैसे देश के वैज्ञानिकों ने ली राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह की क्लास?

यह पत्र देश के चुनिंदा वैज्ञानिकों ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह को कुछ दिन पहले उनके एक विवादित बयान के संदर्भ में लिखा है. इस बयान में सत्यपाल सिंह ने कहा था कि ़डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को वैज्ञानिक 30-35 साल पहले ही खारिज कर चुके हैं और इसे पाठ्य-पुस्तकों से हटा […]

इस रिपोर्ट को पढ़ें, फिर कभी नहीं पूछेंगे कि सुभाष चंद्र बोस की मौत कैसे हुई थी?

सुभाष चन्द्र बोस आजादी की लड़ाई के सबसे मुखर और ओजस्वी नाम माने जाते हैं. उन्होंने न केवल देश में रहते हुए अपने विश्वासों के आधार पर आजादी की लड़ाई में योगदान दिया बल्कि विदेशी धरती पर रहकर भी भारत मुक्ति के प्रयासों में संलग्न रहे. पर अफसोस पिछले कुछ वर्षों में उनके जीवन का […]

लोकतंत्र में लोगों को अस्मिताओं की राजनीति से सावधान रहना जरूरी है

यह लेख द इंडियन एक्सप्रेस  के द आइडियाज पेज  पर छपे लेख प्राइड एंड प्रेज्यूडिस  की हिंदी में प्रस्तुति है. इस लेख को लिखने वाले बद्रीनारायण, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद में प्रोफेसर हैं. आप कविताएं भी लिखते हैं. _____________________________________________________________________ स्मृतियों की खुद की राजनीति होती है. जबकि वे एक सामाजिक समूह के […]

रे की राय: बैंक वाले मजे में हैं और यह मजा सारी अर्थव्यवस्था टूटकर बिखर जाने तक चलता रहेगा

प्रकाश के रे वरिष्ठ पत्रकार हैं. भारत मे अंतराष्ट्रीय मसलों के चुनिंदा जानकर लोगों में से एक हैं. विश्व राजनीति के साथ-साथ मीडिया, साहित्य और सिनेमा पर भी आप गहरी समझ रखते हैं. _________________________________________________________________________ कार्ल मार्क्स का कहना था कि पैसा इतिहास की धारा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है और इस पैसे […]

संपादकीय: सवा दो करोड़ देशवासी नहीं रहे फिर भी हम मुर्दा शांति से क्यों भरे हैं?

हम असम को नहीं जानते. बस मानचित्रों, किताब के कुछ पन्नों और अख़बार की सुर्ख़ियों से असम का हल्का-फुल्का परिचय हासिल किया है. यह परिचय भी केवल नाम और राजधानी छोड़कर यादों के कोने में बहुत देर नहीं टिकता. लेकिन भारतीयता का एक जुड़ाव है, जो बिना जाने, सोचे-समझे असम से एक लगाव के रूप […]

फिल्म रिव्यू: ‘मुक्काबाज’ उत्तर भारतीय दर्शकों के साथ किया गया अब तक सबसे बड़ा धोखा है

मेरे गुरू जी कहते हैं कि कभी भी सिनेमा की समीक्षा उसके तकनीकी पहलुओं पर नहीं करनी चाहिये. सिनेमा एक आर्ट फॉर्म है, जिसमें प्रभावोत्पादकता होती है. फिल्म रिव्यू साधारण दर्शक के लिये लिखे जाते हैं इसलिये फिल्मों की भी साहित्य और संगीत की तरह आलोचना होनी चाहिये, उनकी प्रभावोत्पादकता के लिये. इस भूमिका की […]