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ओपिनियन: नागरिक होने के नाते सड़क पर उतरना जरूरी है, जो लोग ऐसा कर रहे वही देशभक्त

पुलिस ने कहा है कि हर्ष मंदर (Harsh Mander) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी कर कोर्ट की अवमानना की है जिसके लिए मंदर के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना (Contempt) की कार्रवाई हो. लेकिन अपना वजूद खोती संस्थाओं की ओर से उनपर ऐसी कार्रवाई क्या वाकई वाजिब है?

पढ़ें कैसे देश के वैज्ञानिकों ने ली राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह की क्लास?

यह पत्र देश के चुनिंदा वैज्ञानिकों ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह को कुछ दिन पहले उनके एक विवादित बयान के संदर्भ में लिखा है. इस बयान में सत्यपाल सिंह ने कहा था कि ़डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को वैज्ञानिक 30-35 साल पहले ही खारिज कर चुके हैं और इसे पाठ्य-पुस्तकों से हटा […]

इस रिपोर्ट को पढ़ें, फिर कभी नहीं पूछेंगे कि सुभाष चंद्र बोस की मौत कैसे हुई थी?

सुभाष चन्द्र बोस आजादी की लड़ाई के सबसे मुखर और ओजस्वी नाम माने जाते हैं. उन्होंने न केवल देश में रहते हुए अपने विश्वासों के आधार पर आजादी की लड़ाई में योगदान दिया बल्कि विदेशी धरती पर रहकर भी भारत मुक्ति के प्रयासों में संलग्न रहे. पर अफसोस पिछले कुछ वर्षों में उनके जीवन का […]

लोकतंत्र में लोगों को अस्मिताओं की राजनीति से सावधान रहना जरूरी है

यह लेख द इंडियन एक्सप्रेस  के द आइडियाज पेज  पर छपे लेख प्राइड एंड प्रेज्यूडिस  की हिंदी में प्रस्तुति है. इस लेख को लिखने वाले बद्रीनारायण, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद में प्रोफेसर हैं. आप कविताएं भी लिखते हैं. _____________________________________________________________________ स्मृतियों की खुद की राजनीति होती है. जबकि वे एक सामाजिक समूह के […]

‘टॉप टेन यू टर्न’- इन दस मुद्दों पर मोदी सरकार ने देश को बुरी तरह गुमराह किया

अमेरिकन अख़बारों में एक बेहतरीन चलन है. वह उम्मीदवार द्वारा चुनाव से पहले किये जाने वाले दावों/वादों की कठोर समीक्षा करते हैं. कई बार अखबार वादाखिलाफी या मुद्दों पर स्टैंड में बदलाव को ले कर लम्बे समय तक अभियान चलाते हैं. अपने देश में भी ऐसा पत्रकारीय काम यदा-कदा होता रहा है. राजनीतिक वादाखिलाफी को […]

जॉन एलिया: जिन्हें मीडिया ने ‘फेसबुकिया शायर’ बता दिया, उन्हें पाकिस्तान कैसे देखता है

जॉन एलिया वजूद के हर एक इंच तक शायर थे जिंदगी से रूठी हुई रचनाओं से मेरा बहुत करीब का वास्ता है. यह रचनाएँ, चाहें वह किसी भी प्रारूप में हों, मुझे अपनी ओर खींचती रही हैं. इस खिंचाव की वजह से ही कम दूरी की ही सही, पर एक साहित्यिक चहलकदमी मुमकिन हो सकी […]

बेनेडिक्ट एंडरसन: जिनके विचारों ने दुनिया को देखने का नज़रिया ही बदल दिया

आखिरी बहुज्ञानी: बेनेडिक्ट एंडरसन एक विद्वान और इंसान के तौर पर (रामचंद्र गुहा ने यह लेख करीब दो साल पहले बेनेडिक्ट एंडरसन के देहांत के बाद प्रतिष्ठित अंग्रेजी रिसर्च पत्रिका इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के लिये लिखा था. यहां हम आपके लिए उस लेख का संक्षिप्तानुवाद पेश कर रहे हैं.) बेनेडिक्ट एंडरसन जिनकी दिसंबर, 2015 […]

हमारे बच्चे जिस तरह से पढ़ रहे हैं क्या वो हमसे भी बुरी जिंदगी जीने वाले हैं?

शिव विश्वनाथन भारत के उन चुनिंदा विद्वानों में से एक हैं जिन्हें विज्ञान और समाज के आपसी संबंधों की गंभीर समझ है। देश-विदेश की प्रमुख पत्रिकाओं में उनके आलेख समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। उनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है – Theatres of Democracy. यह लेख इसी पुस्तक के लिया गया है. शिव […]