January 24, 2020 By Ajay Kumar 0

वनवासी अधिकारों का हनन आखिर कब तक?

आधुनिक विकास की समझ वनवासी समुदाय को पिछड़ा मानती है। इसी संदर्भ में यह समझ वनवासियों से जंगल ह़़ड़पती है। इस समझ का पानी अब माथे से ऊपर बहने लगा है। इसलिए, महाराष्ट्र विधानसभा को घेरने पहुंचे लाखों किसान साथियों की एक मांग यह भी है कि वन विभाग द्वारा कब्जा की गयी जमीनों का मालिकाना हक उन्हें वापस किया जाए।

इसमें  कोई दो राय नहीं  है कि वनवासी समुदाय आधुनिक तौर-तरीकों के लोकप्रिय वैश्विक मानकों के नजरिये से पिछडे़ हैं। लेकिन आधुनिक समय के सफर में होने वाले तमाम तरह की भीड़न्तों की वजह से स्थानीय स्तर का भी विकास होता है। ज़िन्दगी अगर विलासिताओं के बिना जरूरतों के आधार पर जीने का नाम है तो वनवासी समुदाय से अधिक आधुनिक कोई नहीं, क्योंकि इन्हें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर ज़िंदा रहने का हुनर आता है।

वनवासियों के संदर्भ में विकास के आधुनिक तौर-तरीके  केवल  लाभ कमाने के हथकंडे लगते हैं। ये तरीके वनवासी समूह के जीवन में सुधार की कोशिश ही नहीं करते हैं बल्कि इन तरीकों का सारा मकसद ज़मीन और जंगल से लाभ कमाने जैसा लगता है।

आदिवासी समुदाय के लम्बे संघर्ष के बाद साल 2006 में वनवासी अधिकार कानून बना। इस कानून के तहत पहली बार वनवासी संघर्ष के ज़मीन पर मालिकाना संघर्ष को निपटाने का क़ानूनी रास्ता सुझाया गया। इस कानून के तहत निजी व्यक्ति के बजाए पूरा समुदाय जमीन का मालिक होगा। यानी कि वन-जमीन के व्यापार से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरे समुदाय के सामूहिक निर्णय के बाद ही संभव हो सकेगी। सामूहिक निर्णय करने का अधिकार ग्रामसभा को होगा जो वन समिति के जरिये निर्णय करेंगी। इस तरह से  वनों पर आश्रित समुदाय से ग्रामसभा की अनुमति के बिना जमीन हड़पना कानूनन जु़र्म है। साथ ही वनों की उपज का आर्थिक उपयोग करने का पहला हक भी वनवासियों को है। यानी कि तेंदू पत्ते बेचकर जीविका चलाने का हक वनवासियों को पहले है, बाद में किसी और को है।

लेकिन यह सारी बातें कानून का हिस्सा बनकर ही रह गयी हैं। त्रिपुरा को छोड़कर भारत के बहुत सारे राज्यों में इस कानून के तहत आने वाले वन क्षेत्रों का निर्धारण अभी तक नहीं किया गया है। महाराष्ट्र राज्य की हालिया स्थिति तो चौंकाने वाली है। साल 2014 में राज्य सरकार ने वन विभाग को वनों पर नियंत्रण का अधिकार दे दिया। तब से वनों पर वन विभाग जबरन मनमानी कर रहा है। जिन वनों से आर्थिक अंश हासिल करने का पहला हक वनवासियों को है,  उन्हें भुला दिया है। उनके लिए अभी तक वनक्षेत्रों को अधिसूचित नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में वनवासी समुदाय का गुस्सा अगर विधानसभा घेरने का फैसला करे तो आखिरकार किसे दोष दिया जाए। इसके अलावा मौजूदा समय में वनों में  कार्यरत वन विकास निगम भी कई तरह की परेशानी खड़ा करता है।

नागपुर के वरिष्ठ पर्यावरणविद् अभिलास खांडेकर बताते हैं, “जीते-जागते, हरे-भरे जंगलों को बेरहमी से काट दिया जाता है और इनकी जगह पर पौधरोपण कर कहा जाता है कि हम नया पौधा लगा रहे हैं। कुछ समय के बाद पौधे भी मुरझा जाते हैं, क्योंकि इन्हें लगाकर भूल जाया जाता है। इनकी देखरेख नहीं की जाती है। इसके बाद बची रह जाती है खाली जमीन। ऐसी हालत में ग्रामीण-वनवासी और महाराष्ट्र वन विकास निगम के बीच संघर्ष नहीं होगा तो और क्या होगा?”.

वनों पर कब्ज़ा ज़माने के लिए सालों से सतत संघर्ष जारी है। एक तरफ आदिवासी समुदाय और पर्यावरणविद् हैं तो दूसरी तरफ सरकार के स्वामित्व वाले फारेस्ट डेवलपमेंट कारपोरेशन और निजी खिलाड़ी। दूसरी तरफ के लोगों का जोर औद्योगिक बागानों यानी की सागौन, यूकेलिप्टस, रबड़, कॉफी आदि से लाभ कमाने  पर रहा है। इसलिए वनवासी और वन प्रशासन के बीच का संघर्ष अंग्रेजों के दौर से लेकर इस दौर तक मौजूद है।

शहरीकरण के जरिये विकास का राग महाराष्ट्र के वनीय जीवन के संगीत को बिगाड़ रहा है। पिछले कुछ सालों से महाराष्ट्र के आधे दर्जन से अधिक स्थानों पर स्थानीय समुदाय और वन प्रशासन के बीच जंगल काट कर उसकी जगह नये जंगल लगाने को लेकर तनातनी चल रही है। डाउन टू अर्थ  की एक रिपोर्ट के तहत उस समय माहौल बहुत गर्म हो गया जब महाराष्ट्र के भंडारा जिलें में राज्य सरकार ने वन विकास निगम को 200 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र पर सागौन के नये पेड़ लगाने की इजाज़त दी। सरकार के इस फैसले के खिलाफ स्थानीय समुदायों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया. सरकार दबाव में आई और अपना आदेश वापस ले लिया।

“छत्तीसगढ़ बचाओ” आन्दोलन  के अध्यक्ष आलोक शुक्ला  कहते हैं, “वन विकास निगम का वनों का विकास करने का तरीका गजब का है। पहले ये जंगल में घुसकर घने जंगल क्षेत्र को छोटे झाड़ एवं कम सघन वाला जंगल बताते हैं, पुराने पेड़ को सफाई के नाम पर कटवाते हैं, फिर नये पौधे कैम्पा प्रोजेक्ट के तहत लगते हैं। ये पौधे देखते-देखते खत्म हो जाते हैं क्योंकि इनकी देखभाल नहीं की जाती है. इस तरह से जंगल के जंगल साफ़ होते जा रहे हैं।”

केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि प्राकृतिक जंगलों को खत्म कर उनकी जगह पर नये पौधरोपण करने की वजह से वनों की पारिस्थितिकी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। स्थानीय समुदाय तो प्रभावित होता ही है, साथ ही साथ कई किस्म की पर्यावरणीय क्षति भी पहुँचती है। जैसे मिट्टी की बर्बादी ,जैव विविधता की बर्बादी, वन्यजीवों के आवास पर खतरा आदि।

जंगल गायब होते जा रहे हैं। इनको बचाने के लिए जहां जागरूकता का सहारा लिया जा रहा है वहीं वनवासियों को वनों से बेदखल होने के लिए मजबूर भी किया जा रहा है। स्कूली बच्चों के पौधरोपण से स्कूल की मैगज़ीन में तो जंगल दिखाए जा सकते है लेकिन ज़मीन पर उगाये नहीं जा सकते है।

जंगलों को वही बचा सकता है जिसके जीवन की ज़मीन जंगलों से गढ़ी हुई है। विकास का केवल नकलची पैमाना समझने वाली सरकारें स्थानीयता का कत्ल कर देतीं हैं। वनवासियों को जंगलों से बेदखल करने में लग जातीं हैं। जबकि हकीकत यह है कि वनवासी सैकड़ों सालों से जंगलों के रक्षक बने हुए हैं. जंगल उनके डीएनए में हैं.  वे जंगल को इस तरह से काटते है कि वह और बढ़ता है, जबकि सरकारी लोग केवल नौकरी  बचाने के लिए जंगल बचाने का काम करते हैं। वनकर्मी जैसा बन पड़े आड़ा -तिरछा काट कर एक बार में ही पेड़ को जड़ से मार देते हैं।