January 7, 2018 By THE KATHFODWA 0

कमलेश्वर: जिनकी अदालत में गांधी, नेहरु, जिन्ना सब दोषी थे

‘यह लेख चमन मिश्रा ने लिखकर हमें 6 जनवरी को कमलेश्वर की जयंती पर भेजा, जिसे हम एक दिन विलंब से प्रकाशित कर सके। वर्तमान में चमन एक पत्रकार हैं। लेखन में रुचि है। ‘तान्या’ नाम की किताब लिख चुके हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई की है।’

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कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना यानि ‘कितने पाकिस्तान’ के लेखक कमलेश्वर। आज उनकी 86वीं जयंती है। यूपी के मैनपुरी में 6 जनवरी, 1932 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में इस शख्सियत का जन्म हुआ। तीन साल के थे, तब पिता की मौत हो गई। कमलेश्वर का नाम लेते ही ज़हन में सबसे पहले आता है, सांप्रदायिकता और तानाशाही के ख़िलाफ़ मुखालफ़त करने वाला शख्स।

सांप्रदायिकता का विरोध कमलेश्वर के हर शब्द में दिखता है और तानाशाही का इस मायने में कि इंदिरा गांधी के आपातकाल का कमलेश्वर ने जमकर विरोध किया था। यही नहीं जब उन्हें दूरदर्शन का अतिरिक्त महानिदेशक बनाया गया तो इंदिरा से खुद उन्होंने कहा कि मैंने आपातकाल का विरोध किया था, इमरजेंसी के ख़िलाफ़ खूब लिखा। इंदिरा ने कहा कि ‘वो मतभेद अब मैं स्क्रीन पर देखना चाहती हूं।’ ये आपको इसलिए बता दिया कि अब ना तो ऐसे लेखक उपजते हैं, और ना ही ऐसे नेता होते हैं।

कमलेश्वर यूपी के मैनपुरी में जन्मे लेकिन दिल्ली-मुंबई में जीवन बिता दिया। मैनपुरी के कटरा मोहल्ला में उनका पैतृक मकान था। इसी मकान में उन्होंने कहानियों की शुरुआत की थी।

‘कितने पाकिस्तान’, ‘अम्मा’, ‘काली आंधी’, ‘एक सड़क सत्तावन गलियां’, ‘अंतिम सफर’, ‘खोया हुआ आदमी’, ‘तीसरा आदमी’, ‘पति पत्नी और वह’, ‘डाक बंगला’, ‘गर्मियों के दिन’, आदि के लेखक। ‘सारिका’, ‘गंगा’ जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक। ‘दैनिक जागरण’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘दैनिक भास्कर’ के प्रधान संपादक। हिंदी साहित्य में नई कहानियों के जनक। ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘चंद्रकांता’ जैसी फिल्मों-टीवी सीरियल के लेखक।

कमलेश्वर का ये सफर अंत तक नहीं रुका, चलता ही गया। खैर हम रुकते हैं। पर रुकने से पहले हिंदी की उस महान किताब का ज़िक्र जरुरी है जो आज के अतिवादी दौर में हिंदुस्तान के हर शख्स को दो बार पढ़नी चाहिए। जी हां, ‘कितने पाकिस्तान’। राजपाल पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित इस किताब के अब तक सोलह संस्करण आ चुके हैं। इस किताब पर कमलेश्वर को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, बाद में पद्म भूषण भी।

 

“इन बंद कमरों में मेरी सांस घुटी जाती है

खिड़कियां खोलता हूं तो ज़हरीली हवा आती है”

 

कितने पाकिस्तान गाढ़े ‘खून’ से लिखा गया वो उपन्यास जिसके हर हर्फ़ से कमलेश्वर रिसते हैं। अदीब-ए-आलिया कमलेश्वर की अदालत में गांधी, नेहरु, जिन्ना सब दोषी हैं। लाशों के ढेर और मांस के लोथड़ों से भरा पड़ा ये हिंदुस्तान किसने बनाया? धर्म के नाम पर, मंदिर के नाम पर, जाति के नाम पर लोगों में कट्टरता किसने भरी? इसके लिए कमलेश्वर उसी वक्त में जाते हैं, और हर किसी को अपनी अदालत में लाकर खड़ा कर देते हैं।

सुधीश पचौरी लिखते हैं कि “यह उपन्यास मानवता के दरवाजे पर इतिहास और समय की एक दस्तक है.. इस उम्मीद के साथ कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में एक के बाद दूसरे पाकिस्तान बनाने की लहू से लथपथ यह परंपरा अब खत्म हो। अपने असाधारण इतिहासबोध के सहारे कमलेश्वर भारत की पांच हज़ार साल लंबी परंपरा में इतिहास के उन तमाम विभाजनकारी रक्तरंजित प्रसंगों को ऐसे जोड़ते हैं कि समग्र मानवतावादी विमर्श खड़ा हो उठता है।”

 

कमलेश्वर के व्यक्तित्व के कुछ अनछुए पहलू-

 

1. कमलेश्वर ने एक जगह लिखा है कि एक पार्टी में शराब ज्यादा हो गई थी। फिर भी उन्हें कोई स्कॉच का एक पैग दे गया। कमलेश्वर बड़े असमंजस में थे कि क्या करें ?तभी देवानंद उन के पास आए और उन्हें चलने के लिए कहने लगे। कमलेश्वर ने कहा कि यह स्कॉच कैसे ख़त्म करें? देवानंद ने कहा कि ख़त्म करने की जरुरत ही नहीं, छोड़ दीजिए। कमलेश्वर बोले- आखिर स्कॉच है। देवानंद ने उनसे कहा कि ख़राब थोड़े ही होगी, यहीं कहीं रख दीजिए कोई पी जाएगा। कमलेश्वर ने ऐसा ही किया। जाते-जाते उन्होंने मुड़कर देखा तो सचमुच कोई आकर स्कॉच पी गया।

2. काली आंधी उपन्यास जब उन्होंने लिखा था तो काफी बवाल मचा। ज्यादात्तर लोगों का मानना था कि यह इंदिरा गांधी को टारगेट करके लिखा गया है। सुब्रमण्यम स्वामी ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि इंदिरा गांधी का अच्छा चित्रण किया है। कमलेश्वर तुरंत बोले यह उपन्यास इंदिरा गांधी पर नहीं विजयराजे सिंधिया पर है। स्वामी और सिंधिया दोनों उन दिनों जनसंघ में हुआ करते थे।

3. वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार पांडेय बताते हैं कि इन तीनों (कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव) की बनती खूब थी। ‘नई कहानियों’ के दौर में ये तिकड़ी थी। उस समय गोष्ठियों में राजेंद्र यादव कहा करते थे कि कमलेश्वर हांकता बहुत है। हमेशा कहता रहता है कि इंदिरा गांधी उससे सलाह लेती हैं। कई मामलों में उसकी राय मांगती हैं। मुंबई में हेमा मालिनी उसके इंतजार में लाइन लगाकर खड़ी रहती हैं। ये सच भले ना हो, लेकिन कमलेश्वर कम चुहलबाज नहीं थे।

4. कमलेश्वर वैसे तो खुल्लमखुल्ला कांग्रेस के करीबी रहे। लेकिन कई चीज़ें ऐसी भी हैं जो दिखाती हैं कि उनके अंदर वैचारिक नफरत जैसा कुछ नहीं था। जैसे कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने सावरकर को अंग्रेजों से माफी मांगने वाला कहकर देश का गद्दार करार दिया तो उन्होंने दूसरे दिन हिंदुस्तान में अपने नियमित स्तंभ में सावरकर को डिफेंड किया। या फिर आधुनिक ‘करपात्री’ और चोटी के पंडित कहे जाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार विद्यानिवास मिश्र से उनकी खूब बनती थी।

5. कमलेश्वर ने अपने जीवन में 99 फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी। उनके साथ के लोग बताते हैं कि वो अपना शतक पूरा करना चाहते थे, लेकिन इससे पहले ही वो हर पल पाकिस्तान बनाने में तुली इस दुनिया को अलविदा कहकर दूसरी दुनिया में चले गए।

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