December 31, 2017 By Peeyush Parmar 0

2017 अंतिम प्रणाम, भाग-1: कुंवर नारायण, किशोरी अमोनकर, गिरिजा देवी और कुंदन शाह

कुँवर नारायण

अभी बाक़ी हैं कुछ पल,
और प्यार का एक भी पल
बहुत होता है.

प्यार की अमरता का गान करने वाले कवि कुंवर नारायण साल 2017 के 15 नवंबर को इहलोक को छोड़ गए। कुंवर नारायण नहीं रहे लेकिन उनके शब्द जिनमें प्रेम, उम्मीद और साहस घनीभूत हैं, हमें प्रेरणा देने के लिए मौजूद हैं। कुंवर जी भाषा और जगत में बार-बार लौटने की बात करते रहे हैं क्योंकि उनका विश्वास था कि यह प्रत्येक का दायित्व है कि वह संसृति में रचनात्मक हस्तक्षेप करता रहे।

वह ‘वापसी की उद्घोषणा’ करने वाला आदमी थे। उन्होंने कहा है- अबकी बार लौटा तो / वृहत्तर लौटूंगा। मैं यह उम्मीद लिए बैठा हूँ कि वह वापस आयेंगें, असीम सम्भावनाओं का आकाश लिए जिसमें हम अपने सपनों की फसल बोएँगे। वह एक बेहतरीन पाठक थे और महान रचनाकार। उन्होंने कविता में मानवतावाद के नए रूपक गढ़े। प्यार करने से लेकर मृत्यु के द्वार पर नचिकेता बन के खड़े होने तक सब कुछ कुँवर नारायण ने ही सिखाया।

जब भी हताशा के समुद्र के मध्य खुद को फंसा हुआ पाया, वे समझाते रहे कि एक बेहतर कल में वापस लौटना संभव है। मेरा कवि प्रार्थना करने गया है। खुदा के घर से वह हमारे लिए दुआएँ लिए लौटेगा तब तक मैं उसकी कविताओं के साथ उसके जीवन का उत्सव मनाऊंगा क्यों कि उम्मीद नहीं छोड़ती है कविताएँ।

गीत कुंवर जी की परम्परा के समर्थ कवि हैं। उन्होंने कुंवर जी के प्रति श्रद्धांजलि स्वरुप ‘हिंदुस्तान’ में एक लेख लिखा था। पढ़िए यह बेहतरीन लेख…

गीत का लेख : उनसे लंबा उनकी कविता का जीवन

 

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गिरिजा देवी

गोकुल छोड़ मथुरा में छाये
किन संग प्रीत लगाये
तड़प तड़प जिया जाय

24 अक्टूबर के दिन एक एक धारा खंडित हो गयी जो शास्त्रीय और लोक के संगीत को जोड़ती थी। हमने ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी को खो दिया। 88 साल तक रस के भरे नैन गा कर हमारी आंखों में चमक जगाने वाली ज्योति स्वयं लुप्त हो गयी थी। बनारस सूना हो गया था।

संगीत में निहित सादगी की मिसाल बनकर जीने वाली गिरिजा जी ने न केवल गाया बल्कि उस विरासत का उत्तराधिकार नयी पीढ़ी को भी दिया। पद्म भूषण से सम्मानित गिरिजा देवी का जन्म, 8 मई 1929 को, वाराणसी में हुआ था। नौ वर्ष की आयु में, फिल्म में अभिनय भी किया लेकिन संगीत नियति थी।

बनारस घराना ने अपना सबसे अमूल्य सितारा खो दिया है। संगीत का वह दोआब जो शास्त्रीय और लोक से मिलकर बना था, फ़िलहाल सुना पड़ा है। 2018 में एक खोज यह भी हो सकती है कि इस निर्वात में किसके सुर जीवन भर पायेंगें।

यह लेख गिरिजा देवी जी के निधन के बाद के खाली स्थान में उनकी स्मृतियों को टटोलते हुए लिखा गया था जो ‘News 18’ की वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था। पढ़िए…

स्मृतिशेष: परम्परा के सुर की अमर्त्य साधिका गिरिजा देवी

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किशोरी अमोनकर

2017 के अप्रैल की धूप कड़वी थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत ने अपना सबसे शुद्ध स्वर खो दिया। जयपुर घराने की किशोरी अमोनकर जी ने अंतिम साँस ली और मृत्यु के शाश्वत सत्य से सुर मिला लिया। संगीत प्रेमी उन्हीं के गीत के साथ अपनी ‘गानसरस्वती’ को पुकार उठे ‘एक ही संग हुते जो हम और तुम काहे बिछुड़ा रे।’

2002 में पद्म विभूषण से सम्मानित किशोरी जी के लिए संगीत मनोरंजन नहीं था। यह एक साधना है और संगीत की साधना व्यक्ति को दूरदृष्टि देती है और सही पथ का भान कराती है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि संगीत पांचवां वेद है। इसे आप मशीन से नहीं सीख सकते। इसके लिए गुरु-शिष्य परंपरा ही एकमात्र तरीका है। संगीत तपस्या है। संगीत मोक्ष पाने का एक साधन है। गायन दर्शक-श्रोता को आकर्षित कराने के लिए प्रस्तुत नहीं किया जाता।

जब एक साधक राग के सबसे उद्दात सुर पर पहुंचता है और संपूर्ण प्रेम सहित उसे अभिव्यक्त करता है तो राग सजीव व्यक्ति के रूप में समक्ष प्रकट हो जाता है। साधना ऐसी होनी चाहिए जैसे संगीत आपके सामने व्यक्ति रूप में खड़ा हो और आप दर्शक-श्रोता हों। वह संगीत में मोक्ष ढूंढती थी इसीलिए न उन्हें इंटरव्यू देना पसंद था और न ही कार्यक्रम के बीच बातचीत।

किशोरी जी मुख्य रूप से खयाल गायकी के लिए प्रसिद्ध थीं लेकिन उन्होंने हिंदी, मराठी, कन्नड़ और संस्कृत जैसी प्रमुख भाषाओं में ठुमरी, भजन और फिल्मी गीत भी गाए। अध्ययन और रियाज दोनों में खुद को साधने के पश्चात् उन्होंने ‘स्वरार्थरमणी – रागरससिद्धान्त’ नाम से संगीतशास्त्र पर आधारित ग्रंथ की भी रचना की थी।

गायन के अलावा वे एक श्रेष्ठ गुरु भी हैं। उनके शिष्यों में मानिक भिड़े, अश्विनी देशपांडे भिड़े, आरती अंकलेकर जैसी जानी मानी गायिकाएं भी हैं। देश की प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायिका एवं पद्मविभूषण किशोरी अमोनकर पर ‘भिन्न षड़ज’ नामक वृत्तचित्र एक समय के लोकप्रिय फ़िल्म कलाकार अमोल पालेकर और उनकी जीवन संगीनी संध्या गोखले ने बनायी है।

किशोरी जी पर एक प्रसिद्ध लेख सुआंशु खुराना ने ‘The Indian Express’ में लिखा था। सुआंशु भारतीय कला और संगीत के प्रेमी-अध्येता हैं। शायद इसलिए उनके लेखों में औपचारिकता नहीं होती बल्कि भाव और प्रेम से शब्दों को बरता जाता है। पढ़िए इस साल का एक बेहतरीन आलेख…

The loneliness of Kishori Amonkar

आने वाली नस्लें हम पर रश्क करेंगी कि हमने किशोरी अमोनकर को देखा था

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कुंदन शाह

उस रचनाकार को महान मानिये जिसे लोग भूल गए लेकिन उसकी रचना लोगों के दिलों पर राज करती रही। इस वर्ष एक ऐसे ही शख़्स को हमने खोया। ‘जाने भी दो यारों’ जैसी कल्ट कॉमेडी बनाकर भ्रष्टाचार की स्थिति पर रचनात्मक टिप्पणी करने वाले कुंदन शाह की 19 अक्टूबर को मृत्यु हो गयी।

भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान से पढ़े शाह ने तमाम अभावों के बीच कला को ज़िंदा रखा। शाह ने ‘जाने भी दो यारों’ बनाकर एक ऐसा मील का पत्थर स्थापित किया जिसे वह खुद भी पार नहीं कर सके।

उनकी फिल्म का अंतिम दृश्य, समाज में फैले भ्रष्टाचार पर कटाक्ष करता है। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में इसे सबसे बेहतरीन क्लाइमेक्स में से एक गिना जाता है। आज के असहिष्णु माहौल में इसे बनाना खतरनाक साबित हो सकता है। देखिये यह दृश्य और पढ़िए एक बेहतरीन लेख

All That He Wanted Was to Make That Film

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