December 27, 2017 By Avinash 0

भारत में साढ़े दस लाख हेल्थ से जुड़े सेंटर फिर हम हेल्थ में फिसड्डी क्यों?

हमारी रोजमर्रा की बहसों में अक्सर स्वास्थ्य का मुद्दा हाशिए पर ही रहता है। फिर एक हादसा होता है और लोग राजनीति को कोसने लगते हैं कि उसने आधारभूत मुद्दों को इग्नोर किया। फिर हम स्वास्थ्य को जीडीपी में उसपर किये गये खर्चे के हिसाब से मापकर आलोचना करते हैं। मांग होती है सरकार स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाये। बस इतनी ही चर्चा स्वास्थ्य पर हमें देखने को मिलती है।

पर हाल में घटी दो घटनाओं ने स्वास्थ्य क्षेत्र में होने वाली बहसों के फलक को फाड़कर थोड़ा फैलाने की कोशिश की है। पहली घटना है गुड़गांव की, जहां पर डेंगू पीड़ित बच्ची ने 15 दिन तक मौत से जूझने के बाद जीवन को अलविदा कह दिया। जिसका काऱण था कि अस्पताल ने बीमारी के इलाज के लिए 15 लाख का बिल बनाया था, जिसका जुगाड़ करने में माँ-बाप असफल रहे और 15 दिन के बाद बच्ची की मौत हो गई।

दूसरी घटना मैक्स अस्पताल से जुड़ी है, जहां एक ज़िंदा बच्चे को मृत घोषित कर दिया गया। बाद में पता चला कि बच्चा ज़िंदा है तो बचाने की असफल कोशिश हुई। घटना के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री ने हड़बड़ी में मैक्स अस्पताल का लइसेंस रद्द कर दिया। इसके बाद किसी ने कहा की नेता जी बाज़ी मार गए, किसी ने कहा नेता जी ने राजनीति कर दी और किसी ने कहा की नेता जी 56 इन्च वाले नेता जी से छोटा सीना जरूर रखते हैं लेकिन हिम्मत उनके मुकाबले बहुत अधिक है। पर इन सारी बहसों में फिर से स्वास्थ्य का मुद्दा अछूता रहा गया। पर हम फिर से राजनीति की घिसी-पिटी लकीर पीटने लगे।

पर इस प्रवृत्ति की जड़ें गहरी धंसी हैं। एक दौर में जब सरकारों को जब लगा कि पूरे भारत के स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी उनके कंधें नहीं उठा सकते हैं तो उन्होंने स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी उद्यमिता को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। यकीनन उदारीकरण के दौर में लिया गया यह सूझ-बूझ भरा कदम था। इस सूझ-बूझ भरे कदम को सहारा देने के लिए विदेशी निवेश की भी सहयता ली गयी। जो जरूरी थी। बस परेशानी यही थी कि भारत की अधिकांश जनता की हैसियत उतनी नहीं थी जितनी की चाहत निजी अस्पताल करने लगे थे। इसलिए सरकारी अस्पतालों में भीड़ बढ़ी और निजी अस्पतालों में कुछ महत्वपूर्ण रह गया तो सिर्फ पैसा।

कुल मिलाकर जो यह नया स्वास्थ्य-सिस्टम बना था, उसमें कई सारे छेद बनते चले गए। बीमारियों की रोकथाम पर तो सरकार ने काम किया लेकिन निजी अस्पतालों को विनियमित करने की कोशिश कभी नहीं की। बिना रेगुलेशन के प्राइवेट हॉस्पिटल बड़े-बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में बदलते चले गए। इनका संगठन मजबूत होता चला गया। एक मरीज़ के लिए जरूरी सारी सुविधाएं तो यहां मिलने लगी लेकिन मूल कीमत से चार गुनी ज्यादा।

यह भारत जैसे देश के लिए बहुत बुरी हालत है, जहां हेल्थकेयर से जुड़ी लगभग 60 प्रतिशत कीमत जनता की जेब से चुकाई जाती है। जहाँ बहुत बड़ा मध्य वर्ग रहता है जो सरकारी सेवाओं से परेशान रहता है। पर अपने हकों के लिये लड़ने के बजाये कर्ज लेकर सरकारी सेवाओं को त्यागना ज्यादा सही समझता है। इससे जहां एक ओर सरकारी सेवाएं निट्ठल्ली पड़ती जा रही हैं, वहीं इस निठल्लेपन की सबसे बड़ी मार गरीब लोगों को झेलनी पड़ रही है।

लेकिन असली खेल तो तब समझ में आएगा जब हेल्थकेयर से जुड़े विभिन्न उद्यमों की संख्या पता चलेगी। भारत में छोटे-बड़े मिलकार कुल साढ़े दस लाख हेल्थकेयर के उद्यम हैं, जिसमें नर्सिंग होम, डायगनॉस्टिक सेंटर, लैबोरेटरी आदि शामिल हैं। इनमें केवल 8 प्रतिशत अस्पताल हैं, जबकि 50 प्रतिशत जगहों पर केवल एक डॉक्टर काम करता है। सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि अयोग्य डॉक्टरों की आधी संख्या भी कुल योग्य डॉक्टरों के मुकाबले अधिक है।

इस जगह पर आकर सारा माज़रा ऐसे उभरता है जैसे किसी भारी भीड़ के निकलने के लिए हमने केवल एक संकरी सी गली बना रखी हो। जिसमें जिनके पास पैसा है वह तो प्राइवेट हॉस्पटल की महंगी कीमत अदा कर निकल जा रहे हैं लेकिन जिनके पास पैसा नहीं है वह ज़िंदगी बचाने की चाहत में प्राइवेट हॉस्पिटल जाकर ज़िंदगी गिरवी रख दे रहे हैं या कुर्बान हो जा रहे हैं। जो बच रहे हैं वह सरकारी अस्पतालों की भयावहता में ज़िंदगी और मौत से जूझते हुए अपना सफर तय कर रहे हैं।

15 वर्ष की बच्ची आद्या की मौत फोर्टिस हॉस्पिटल में जरूर हुई पर वह स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूद इन्हीं संरचनागत कमियों की भेंट चढ़ी है। जाहिर है अभी भी प्राइवेट हॉस्पिटल अपनी कमाई को ताक पर रखकर कुछ नहीं करेंगे। जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ेगा जो पूरी ज़िंदगी केवल अपने परिवार के बारे में सोचते हैं और राष्ट्रगान के लिए खड़े हो जाना देशप्रेम समझते हैं।

आज़ादी के समय का नर्सिंग होम एक्ट भारत के हर राज्य में काम करता है लेकिन इसके प्रावधानों में उन वाक्यों की कमी है जिसकी इस समय जरुरत है। एक्ट में हेल्थकेयर से जुड़े सभी संस्थानों को रजिस्टर्ड और कैंसिल करने का प्रावधान तो है लेकिन इसका प्रावधान नहीं हैं की जब डॉक्टर या अस्पताल अपनी वाजिब कमाई से ज्यादा वसूलेंगे तब क्या किया जाएगा? तब क्या किया जाएगा, जब ओवर बिलिंग होगी, जब डॉक्टरी के अर्थ से जान बचाने की नियत का नाता टूट जाएगा। इन सवालों के जवाब आज के स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े सरकारी नियमों के पुलिंदों में नहीं है।

ऐसा नहीं कि किसी सख्त कानून की जरुरत का हमारे राजनेताओं को भान नहीं है। लेकिन ऐसा जरूर है की लोभी डॉक्टर की मजबूत लॉबी उन्हें ऐसा करने से रोकती है। डॉक्टर यह नहीं चाहते उनकी कमाई सार्वजनिक हित पर बलिदान कर दी जाए।

ऐसे में दिल्ली के मुख्यमंत्री का फ़िल्मी फैसला लोकतंत्र में राजतंत्र की याद दिलाता है। और जनता की हल्की प्रतिक्रिया यह कि न्याय हमारे जीवन का हिस्सा बना ही नहीं है। फिर नामुमकिन चाहत भी रखते है की हम पर राज करने वाले शासक लोकतान्त्रिक हों।

आप ही बताइये, अगर दिल्ली सरकार का यह कहना है की मैक्स हॉस्पिटल को इस शर्त पर सस्ते दामों पर भूमि दी गयी थी ताकि वह गरीबों का मुफ्त इलाज करते रहे तो पहले ही जांचकर लाइसेंस रद्द नहीं हुआ। दरअसल बात ये है कि सरकारें जानती हैं कि हमारे जनमानस में सिस्टम का दोष का नहीं, भ्रष्टाचार नहीं बल्कि किसी की मौत ही वह ताकत रखती हैं कि आम जनता में नफरत पैदा कर सकें। और इस नफरत को अपने फायदे में मोड़ना ही सत्ता की दावेदारी है।

एक बार यह भी सोचें कि क्या जिस दिन बच्चे की मौत हुई केवल उसी दिन सरकार को पता चला की मैक्स हॉस्पिटल अपनी शर्तों का उल्लंघन कर रहा है? क्या यह सही है कि बिना किसी नोटिस के हॉस्पिटल को बंद करने की घोषणा कर दी जाए जहां कई मौत से जूझते हुए मरीज़ मौजूद हैं। जो बिना डायलिसिस के ज़िंदा नहीं रह सकते। सरकारें इन बातों की तरफ भी सोचती हैं लेकिन हम नहीं सोचते। दरअसल हम अपनी विलासी नफरत में इतना अंधे हो चुके होते हैं की हमें अपनी नफरत को पूरा करने के लिए बेहतरीन सिस्टम की नहीं बल्कि किसी फ़िल्मी हीरो की जरूरत होती है। और सरकारें भावनात्मक फायदे उठाती हैं।