December 14, 2017 By Avinash 0

बेनेडिक्ट एंडरसन: जिनके विचारों ने दुनिया को देखने का नज़रिया ही बदल दिया

आखिरी बहुज्ञानी: बेनेडिक्ट एंडरसन एक विद्वान और इंसान के तौर पर

(रामचंद्र गुहा ने यह लेख करीब दो साल पहले बेनेडिक्ट एंडरसन के देहांत के बाद प्रतिष्ठित अंग्रेजी रिसर्च पत्रिका इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के लिये लिखा था. यहां हम आपके लिए उस लेख का संक्षिप्तानुवाद पेश कर रहे हैं.)

बेनेडिक्ट एंडरसन जिनकी दिसंबर, 2015 के दूसरे हफ्ते (13 दिसंबर) को 79 साल की उम्र में मौत हो गई, समाज विज्ञान के आखिरी महान बहुज्ञानी थे. वह एक ही वक्त में एक राजनीति विज्ञानी, इतिहासकार, समाज विज्ञानी, साहित्य सिद्धांतकार और जीवनी लेखक सभी कुछ थे. वह जबरदस्त तरह से कई भाषाएं बोल लेते थे, करीब आधी दर्जन यूरोपीय और कुछ चार या पांच एशियाई भाषाएं उन्हें आती थीं.

उनके ज्ञान, उनकी प्रतिभा के कारण विषयगत, सामयिक और भौगोलिक सीमाएं पार कर जाता था. बेनेडिक्ट एंडरसन के बस दो साथी थे: अर्नेस्ट गेलनर (1925-95) और एरिक हॉब्सबाम (1917-2012). गेलनर और हॉब्सबाम यूरोपियन यहूदी थे जो नाजियों के उदय के वक्त प्रवासी होकर इंग्लैण्ड में बसने को मजबूर हुये थे. एंडरसन का जन्म चीन के कुनमिंग नाम के शहर में हुआ था, वह एक आयरिश कस्टम ऑफिसर के बेटे थे. बाद में उनका परिवार कैलिफोर्निया चला गया और उसके बाद आयरलैंड.

बेन एंडरसन की पहली डिग्री यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज से क्लासिक्स (शास्त्रीय) में थी. इसके बाद उनका रुझान उपनिवेश-विरोधी राजनीति में हो गया, जिसके लिये उन्होंने इंडोनेशिया को चुनने से पहले, भारत में काम करने के बारे में सोचा था. वह कार्नेल यूनिवर्सिटी चले गये, जहां उन्होंने इंडोनेशियन नेशनलिज्म के प्रणेता विद्वान जॉर्ज कहिन के सानिध्य में पढ़ाई की. कहिन ने दक्षिण-पूर्वी एशियाई अध्ययन का एक बेहतरीन प्रोग्राम तैयार किया था. इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, वियतनाम और थाईलैंड के इतिहासकारों, भाषाविदों, मानवविज्ञानियों और राजनीतिविज्ञानियों और ख्यात विशेषज्ञों को एक साथ मिलाकर यह प्रोग्राम तैयार हुआ था.

(रामचंद्र गुहा के वृहत् लेख में से एंडरसन की राष्ट्रवाद की समझ पर आधारित भाग का यहां अनुवाद दिया गया है.)

देश के लिये प्यार

एक बार यूनिवर्सिटी ऑफ ओस्लो में जनता से बातचीत के दौरान बेनेडिक्ट एंडरसन ने मज़ाक के लहज़े में कहा,

मैं शायद ऐसा एकमात्र व्यक्ति हूं जो राष्ट्रवाद के बारे में लिख रहा और उसे बुरा नहीं मानता.

जबकि गेलनर और हॉब्सबाम जैसे विद्वान राष्ट्रवाद के बारे में तल्ख नज़रिया रखते हैं. एंडरसन मानते थे कि राष्ट्रवाद एक आकर्षक विचार हो सकता है, ‘मुझे इसके आदर्शवादी तत्व पसंद हैं. और जैसे इसने काम किया, इसने लाभदायक तरीकों से (और ज्यादातर शांतिपूर्ण भी) सामाजिक विचारों के आदान-प्रदान को बड़े और जटिल समुदायों में पहुंचने में सहायता की है और सामुदायिक जीवन को शुरू किया है.’ जैसा की एंडरसन ने एक जापानी अखबार से बातचीत में कहा था, ‘अमेरिका में अगर लोग अमेरिका पर विश्वास नहीं करते तो पांच मिनट में एक-दूसरे को गोली मारकर खत्म हो चुके होते.’ राष्ट्रवाद एक तरह का गोंद है जो बड़े समुदायों में लोगों को कानून पालन करने और एक-दूसरे की इज्जत करने के लिये बाध्य करता है. उन्होंने जोर देकर कहा, ‘हर दिन के सामान्य जीवन पर इतना भला प्रभाव डालने वाले तत्व के बारे में और कुछ भी सोच पाना मुश्किल है.’

‘इमैजिन्ड कम्युनिटीज’ में एंडरसन लिखते हैं,

‘उस वक्त प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के लिए यह बात बहुत ही सामान्य थी कि वे राष्ट्रवाद के तर्कहीन चरित्र पर जोर देते क्योंकि इसकी जड़ें डर और दूसरों से नफरत करने जैसी बातों में हैं. यह हमारे लिये याद रखना जरूरी है कि राष्ट्र प्यार, और कई बार नितांत आत्मबलिदानी प्रेम के लिए प्रेरित कर सकता है.’

उन्होंने जोड़ा-

राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक उत्पाद- कवितायें, गद्य, कथा साहित्य, संगीत, मूर्तिकला- इसी प्रेम को दूसरी हज़ारों अलग विधाओं और तरीकों के माध्यम से भी दिखाते हैं. जबकि दूसरी ओर ऐसे राष्ट्रवादी उत्पादों के जरिए डर और घृणा का रंचमात्र भी प्रदर्शन दुर्लभ है.

आपको बहुत सी राष्ट्रवादी प्रेम की कवितायें मिल जायेंगी पर राष्ट्रवादी घृणा की (कविताएं) बहुत कम ही मिलेंगीं. जातिवाद डर पैदा करता है, वहीं राष्ट्रवाद आशा पैदा करता है. या एक बार अंत में इमैजिन्ड कम्यूनिटीज को फिर से उद्धृत करें तो, ‘जहां तक बात है राष्ट्रवाद ऐतिहासिक नियति के रूप में सोचता है, जबकि जातिवाद अंदर की दूषित सोच को सामने रखता है.’

पर जैसा कि एंडरसन बखूबी जानते थे, राष्ट्रवाद का एक स्याह पक्ष भी होता है, खासकर तब जब यह राजसत्ता के साथ मिल जाता है. एशिया के बहुनृजातीय देशों में, राष्ट्रवाद अक्सर अल्पसंख्यकों को पीटने के लिये एक छड़ी जैसे प्रयोग किया गया है. उन्हें बहुसंख्यकों जैसा होना पड़ा है, नहीं तो उन पर दबाव डाले गये हैं और उन्हें सताया गया है.

ठीक उसी वक्त, अमीर और शक्तिशाली यूरोपीय देशों में, अपने देश को अपने देश को मानवता की भलाई के लिये चुना हुआ देश मानने का रुझान रहा है, जिसे दुनिया को अंधकार से निकालने का काम सौंपा हुआ है. यह चुने हुये देश का सिद्धांत खासकर उनके ऊपर उस देश के चलते हावी हुआ होगा, जहां एंडरसन ने अपनी ज्यादातर युवावस्था गुजारी, यानि अमेरिका के चलते. वहां पर राष्ट्रवाद की हेकड़ी ने दुनिया भर में उन्हें पूंजीवादी साहसिक जोखिम लेने को मजबूर किया.

अपने इस स्याह पक्ष को बनाये रखने के लिये राष्ट्रवाद को कई छूट ही नहीं देनी पड़ीं बल्कि इन तत्वों को बढ़ावा देना पड़ा- शर्म, स्वआलोचना और स्वसुधार. एंडरसन ने एक बार प्रस्तावित किया कि सभी तरह की सोच रखने वालों, चिंतनशीलों, राष्ट्रवादियों को एक नारा स्वीकार कर लेना चाहिये, ‘शर्म अमर रहे!’

1998 में आखिरकार इंडोनेशिया में जब सुहर्तो के लंबे, बेरहम शासन का अंत हो गया. अगले साल, एंडरसन को दोबारा इंडोनेशिया के दौरे की अनुमति मिल गयी. उनको एक टेम्पो नाम की मैग्जीन के रीलांच के मौके पर बोलने को कहा गया. एंडरसन का भाषण इंडोनेशिया के लोगों को खुद के आदर्शों को दशकों तक नुकसान पहुंचाने देने के लिये एक लगावभरी झिड़की था.

उन्होंने जकार्ता के अपने भाषण में अपनी बड़ी और विविधता भरी ऑडियंस को मिलिट्री डिक्टेटरशिप से न लड़ने के लिये फटकार लगाई. उन्होंने इस प्रकृति को उपनिवेश रहे देशेों में एक बड़ी समस्या के रूप में देखा,

‘आधुनिक विश्व ने ऐसे कई देशों के पर्याप्त उदाहरण सामने रखे हैं, जिससे सामने आता है कि ऐसे देशों में कई नागरिकों के कांपते दिलों और दबे दिमागों की वजह से ऐसा होता है. जिसकी वजह से वह अपने साथियों पर ताकत की भूख रखने वाले के हमले का मुकाबला नहीं कर पाते.’

इंडोनेशिया में वर्चस्व की वासना ईरान के आइश लोगों और सबसे अधिक पूर्वी तिमोर के लोगों के प्रति जाहिर हुई. एंडरसन ने सेना के जंगलीपन रवैये की कड़ी आलोचन की. सेना के व्यापक रूप से किये गए क्रूर व्यवहार से इन जगहों के लोग गहरे तौर पर अलगाव महसूस करने लगे थे. उन्होंने इंडोनेशिया की राजनीति में उभरती हुए गिरोहबाजी की कड़ी भर्त्सना की. अपने जकार्ता भाषण में, एंडरसन ने चेतावनी दी कि

वह राष्ट्र जो कथित तौर पर अपने अतीत को गौरवशाली बताने में लगा रहता है, ऐसा करते हुए वह जानबूझकर वर्तमान की हिंसा और असमानता से मुँह फेरने की कोशिश करता है.

इंडोनेशिया की स्थिति सेना और राजनीतिक भ्रष्टाचार से राज्य पर कब्ज़ा जमाने की गवाही दे रही है जहां ईसाई, चीनी और अन्य नृजातीय समूह पर राज्य की भयंकर हिंसक कार्रवाई देखी जा सकती है. इस तरह से अपने भाषण में आगे बढ़ते हुए एंडरसन जनता से कहते हैं,

‘कोई भी जो अपने अपने राज्य या सरकार द्वारा अपने साथ के नागरिकों पर होने वाले अत्याचार से शर्मसार महसूस नहीं करता वह सच्चा राष्ट्रवादी नहीं हो सकता.’

गाली बन चुकी हुकूमत के बाद भी एंडरसन को यह उम्मीद है की ये लोग और इनका साझा राष्ट्र फिर से उद्धारक बन जाएंगे. डच उपनिवेशकों के खिलाफ लड़ते हुए स्थापित किये गए आदर्शों और देशभक्तों के त्याग को याद करते हुए एंडरसन घोषित करते हैं मैं विश्वाश करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि साझी परियोजना को असलियत में बहाल किया जा सकता है जिसे आज से लगभाग 100 साल पहले शुरू किया गया था.

जकार्ता में घर वापसी के भाषण में एंडरसन तर्क देते है कि

राष्ट्रवाद अतीत से मिली हुई कोई विरासत नहीं है बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक साझी परियोजना है. राष्ट्र का आदर्श दूसरे के बजाए खुद से त्याग की माँग करता है.

यही कारण की इंडोनेशिया की आज़ादी के संस्थापकों ने कभी दूसरे इंडोनेशियाई को मारने का अधिकार नहीं लिया बल्कि जेल जाने के साहस को, पीटे जाने के दर्द को, खुशहाल भविष्य और अपने साथियों के आज़ादी के लिए खुद के त्याग को सहर्ष स्वीकार किया.
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(अनुवाद अविनाश द्विवेदी ने किया है. जिनके लिये इस कुल 6000 से भी ज्यादा शब्दों के लेख का अनुवाद कर हिंदी के पाठकों को सुलभ कराना एक सपना था. अनुवाद में साथ दिया है, अजय कुमार ने. परंतु अनुवाद की सारी गलतियां अविनाश की मानी जायें.)